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Showing posts from October, 2018

इन ग्रहों के युति होने से होता है ऐसा

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सूर्य का हमारे जीवन पर प्रभाव और अन्य ग्रहों से युति का फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य मंगल और चन्द्र की युति फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य के साथ मंगल और चन्द्र के होने से पिता पराक्रमी और जिद्दी स्वभाव का माना जाता है,जातक या पिता के पास पानी की मशीने और खेती करने वाली मशीने भी हो सकती है,जातक पानी का व्यवसाय कर सकता है,जातक के भाई के पास यात्रा वाले काम होते है,जातक या पिता का किसी न किसी प्रकार का सेना या पुलिस से लगाव होता है। सूर्य मंगल और बुध युति फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य के साथ मन्गल और बुध के होने से तीन भाई का योग होता है,अगर तीनो ग्रह पुरुष राशि में हो तो,सूर्य और मन्गल मित्र है,इसलिये जातक के दो भाई आज्ञाकारी होते है,बुध मन्गल के सामने एजेन्ट बन जाता है,अत: इस प्रकार के कार्य भी हो सकते है,मंगल कठोर और बुध मुलायम होता है,जातक के भाई के साथ किसी प्रकार का धोखा भी हो सकता है। सूर्य मंगल और गुरु युति फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य मन्गल और गुरु के साथ होने पर जातक का पिता प्रभावशाली होता है,जातक का समाज में स्थान उच्च का होता है,जीवात्मा स

पितृ दोष में करें यह उपाय

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पितृ दोष क्या है और क्यों उसका समाधान जरूरी...? पितृ दोष के बारे में जब भी कोई उपाय या विधान की बात आती है  हर एक का नजरिया अलग अलग सामने आता है.. कई लोग इनको टोटका बताते है कोई जादू कहता है.. कोई बेकार की दकियानूसी बातें कहता है.. कोई अंधविश्वास की संज्ञा देता है.. कोई पंडितों द्वारा लूटने की प्रक्रिया कहता है.. जैसा समाज होता है वैसा उदाहरण मिलता है.. लेकिन कोई भी खराब बात समाज के अन्दर टिक नहीं सकती है.. अगर किसी बात को जबरदस्ती किसी खराब बात को टिकाने की कोशिश की जाती है वह अधिक से अधिक सौ साल टिकेगी.. उसके बाद तो पीढी बदलेगी और उस बात को कोई महत्व ही नहीं देगा... अच्छा या बुरा तो एक बच्चा भी समझता है.. हमारे से भी बडे बडे विद्वान इस पृथ्वी पर आ चुके है.. हम कुछ नही उसके सामने.. हमारे से भी बडे तर्क करने वाले इस धरा पर उत्पन्न हो चुके हैं.. अगर ज्योतिष या इसके द्वारा बताये गये कारण गलत होते तो न जाने कब का यह विषय लुप्त हो चुका होता.. वैदिक ज्योतिषानुसार समय की गणना आज से २०७४ साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने उज्जैन नगरी से शुरु की थी.. और उन्ही के नाम से आज भी विक्रमी संवत चल

बुध और राहु से बनता है यह योग

आज द्विग्रही योग में बात करते है बुध और राहु की..! बुध-राहु::-- जिस जातक की कुंडली मे बुध-राहु का योग 3,6,10, एवं 11 वें भावो में घटित हो तो जातक तीव्र बुद्धि वाला, अकस्मात- धन लाभ पाने वाला, उच्चप्रतिषिठत लोगो के साथ सम्बन्ध रखने वाला, व्यापार या सर्विस में लाभ व उन्नति पाने वाला होता है। बुध-राहु का योग जातक को कार्य कुशल, व्यवहार-शील, गणित, एकाउंटस, वकालत, मैडिकल आदि क्षेत्रों में सफलता करवाता है। यह योग वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु, मकर, कुम्भ, व मीन लग्न में अच्छा फल प्रकट करता है। जबकि अन्य लग्नो में शरीर कष्ट, तनाव, व गुप्त रोग आदि अशुभ फल देता है..!!

सूर्य ग्रह के उपाय

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सूर्य सम्पूर्ण जगत के पालक हैं । सूर्य के बिना जगत की कल्पना मात्र भी सम्भव नहीं है । देव ग्रहों की श्रेणी में आने वाले सूर्य स्वभाव से क्रूर माने जाते हैं । आत्मा के।  कारक सूर्य देव की उपासना का प्रचलन भारत में वैदिक कल से ही रहा है । ये पेट, आँख, हड्डियों, हृदय व चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं । सूर्य सातवीं दृष्टि से देखते हैं व इनकी दिशा पूर्व है । सूर्य की महादशा छः वर्ष की होती है । कुंडली के दशम स्थान में सूर्य देवता (Sun Planet ) को दिशा बल मिलता है । चंद्र, मंगल, गुरु सूर्य देव के मित्र व शुक्र तथा शनी शत्रु की श्रेणी में आते हैं । ज्योतिष शास्त्र में मेष लग्न की कुंडली में सूर्य को इष्ट देव माना जाता है । सिंह लग्न की कुंडली के इष्ट देव वृहस्पति देवता होते हैं । कृतिका , उत्तराशाढा व उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र सूर्य देव से सम्बन्धित हैं । पिता के कारक सूर्य देवता मेष राशि में उच्च व तुला राशि में नीच के माने जाते हैं ।                                                             दिन-रविवार रंग – लाल अंक – 1 दिशा – पूर्व राशिस्वामी – सिंह ( Leo ) नक्षत्र स्वामी – कृतिका, उ

शरद पूर्णिमा में करें ये उपाय|23/10/2018|Astro world

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तुलसीदास जी जीवन परिचय

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संतो की कड़ी में आज जानते है महान भक्त व संत तुलसीदास जीे के बारे में। जब तुलसीदास बाबा ने रामायण वाल्मीकि रामायण को सरल से सरल शब्दों मे चोपाईयो सोटो में लिखी। उससे पहले रामायण कठिन संस्कृत मे थी।ओर रामायण को हर वर्ग हर आदमी नही पढ ओर समझ सकता था। जब तुलसीदास बाबा ने श्री हनुमानजी द्वारा तुलसी रामचरित मानस लिखी तो उसका बहुत से बुध्दि जिवो ने विरोध किया।रामायण को गर्थ की अनुमति नही दी।यह विवाद महाराजा के उपस्थिति में ब्राम्हणों की महासभा में यह कहाँ गया की महादेव जी अगर तुलसीदास बाबा की रामायण पर हस्ताक्षर कर देगे,तो हम हमारी स्वीकृति दे देगे, नही तो नही देगे। तुलसीदास बाबा ने सभी की बात को स्वीकार कर लिया...। भोलेनाथ महाकाल शिव मंदिर मे सभी पुराणों ग्रथों के निचे तुलसीदास जी की रामायण रखी गयी।ओर मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया गया। ओर सभी बाहर पहरा देने लग गये....। जब सुबह मंदिर खुला गया,तो तुलसीदास जी की रामायण सबसे ऊपर थी,ओर उसपर भोले बाबा देवो के देव महादेव जी के हस्ताक्षर थे।ओर फुल ही फुल थे। तब सभी की सहमति से तुलसीदास जी की रामायण को विद्वानो द्वारा सहमति मिली। ओर आज घर घर

संत मलूक दास जी जीवन परिचय

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सन्तों की इस कड़ी में आज जानते हैं,महा विलक्षण सन्त मलूक दास जी के बारे में।मेरा कोटि कोटि प्रणाम। संत मलूक जी कहते हैं कि                       ----------------- ------------                भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आये हाथ।              दिल फकीरी जे हो रहे, साहेब तिनके साथ।             ‘‘साधुओं का वेश धारण करने से कोई सिद्ध नहीं हो जाता क्योंकि मन को वश करने की कला हर कोई नहीं जानता। सच तो यह है कि जिसका हृदय फकीर है भगवान उसी के साथ हैं।’’                ‘‘मलूक’ वाद न कीजिये, क्रोधे देय बहाय।               हार मानु अनजानते, बक बक मरै बलाय।।           ‘‘किसी भी व्यक्ति से वाद विवाद न कीजिये। सभी जगह अज्ञानी बन जाओ और अपना क्रोध बहा दो। यदि कोई अज्ञानी बहस करता है तो तुम मौन हो जाओ तब बकवास करने वाला स्वयं ही खामोश हो जायेगा।’’ संत मलूकदास जी महाराज का जन्म उत्तरप्रदेश के कौशांबी जिले केग्राम कड़ा माणिकपुर में वैशाख कृष्ण पंचमी (गुरुवार) को हुआ था। उनमें बाल्यावस्था में ही कविता लिखने का गुण विकसित हो चुका था। उन्होंने जो भी शिक्षा प्राप्त की, वह स्वाध्याय, सत्संग व भ्रम

संत रामानुजाचार्य जीवन परिचय

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संतों की इस कड़ी में आज बात करते है और जानते हैं ,श्रीमदाद्य जगद्गुरु स्वामी रामानुजाचार्य जी के बारे में।मेरा कोटि कोटि प्रणाम।। वेदों के निषेधाज्ञा पालन के नाम पर जब अल्पबुद्धि व्यक्तियों के प्रभाव में अन्धविश्वास पूर्ण कर्मकांड और निर्दयतापूर्वक पशु-हत्या हो रही थी और वेदों पर आधारित यथार्थ धर्म शिथिल पड़ने लगा था, तब एक समाज-सुधारक के रूप में इस धरातल पर बुद्ध प्रकट हुए । वैदिक साहित्य को पूर्णता से अस्वीकार करके उन्होंने तर्कसंगत नास्तिकतावाद विचारों एवं अहिंसा को जीवन का सर्श्रेष्ठ लक्ष्य बताया । कुछ ही समय बाद शंकराचार्य के दर्शन और सिद्धांतों ने बौद्ध विचारों को पराजित किया और सम्पूर्ण भारत में इसका विस्तार हुआ। शंकराचार्य द्वारा उपनिषदों और वैदिक साहित्य की प्रामाणिकता को पुनर्जीवित किया गया और बौद्ध मत के विरुद्ध, अस्त्र के रूप में प्रस्तुत किया गया । वेदों की व्याख्या में शंकराचार्य एक निष्कर्ष पर पहुंचे की जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, और उन्होंने ‘अद्वैत-वेदांत’ मत स्थापित किया । उन्होंने प्रधानरूप से उन श्लोकों को महत्त्व दिया जिनसे बौद्ध मत के तर्कसंगत नास्तिकताव

चैतन्य महाप्रभु जीवन परिचय

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सन्तों की इस कड़ी में आज बात करते है ,महान संत चैतन्य महाप्रभु की।मेरा कोटि कोटि प्रणाम। चैतन्य महाप्रभु - जीवन परिचय | पूरा पढ़ें। चैतन्य महाप्रभु का जन्म संवत् १५४२ विक्रमी की फाल्गुनी पूर्णिमा, होली के दिन बंगाल के नवद्वीप नगर में हुआ था । उनके पिता का नाम पंडित जगन्नाथ मिश्र और माता का नाम शचीदेवी था। पिता सिलहट के रहनेवाले थे। नवद्वीप में पढ़ने के लिए आये थे। बाद में वहीं बस गये। वहीं पर शचीदेवी से विवाह हुआ। एक के बाद एक करके उनके आठ कन्याएं पैदा हुईं और मरती गईं। फिर एक लड़का पैदा हुआ। भगवान की दया से वह बड़ा होने लगा। उसका नाम उन्होंने विश्वरूप रखा। विश्व रूप जब दस बरस का हुआ तब उसके एक भाई और हुआ। माता-पिता की खुशी का ठिकाना न रहा। बुढ़ापे में एक और बालक को पाकर वे फूले नहीं समाये। कहते हैं, यह बालक तेरह महीने माता के पेट में रहा। उसकी कुंडली बनाते ही ज्योतिषी ने कह दिया था कि वह महापुरूष होगा। यही बालक आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु हुआ। बालक का नाम विश्वंभर रखा गया। प्यार से माता-पिता उसे 'निभाई' कहते। एक दिन की बात है। बालक के स्वभाव की जांच करने के लिए प

स्वामी विवेकानंद जीवन परिचय

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संतों की इस कड़ी में आज जानते है।महान महापुरुष योगी विवेकानंद की।कोटि कोटि प्रणाम। महान प्रेरणा स्रोत – स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को सूर्योदय से 6 मिनट पूर्व 6 बजकर 33 मिनट 33 सेकेन्ड पर हुआ। भुवनेश्वरी देवी के विश्वविजयी पुत्र का स्वागत मंगल शंख बजाकर मंगल ध्वनी से किया गया। ऐसी महान विभूती के जन्म से भारत माता भी गौरवान्वित हुईं। बालक की आकृति एवं रूप बहुत कुछ उनके सन्यासी पितामह दुर्गादास की तरह था। परिवार के लोगों ने बालक का नाम दुर्गादास रखने की इच्छा प्रकट की, किन्तु माता द्वारा देखे स्वपन के आधार पर बालक का नाम वीरेश्वर रखा गया।प्यार से लोग ‘बिले’ कह कर बुलाते थे। हिन्दू मान्यता के अनुसार संतान के दो नाम होते हैं, एक राशी का एवं दूसरा जन साधारण में प्रचलित नाम , तो अन्नप्रासन के शुभ अवसर पर बालक का नाम नरेन्द्र नाथ रखा गया। नरेन्द्र की बुद्धी बचपन से ही तेज थी।बचपन में नरेन्द्र बहुत नटखट थे। भय, फटकार या धमकी का असर उन पर नहीं होता था। तो माता भुवनेश्वरी देवी ने अदभुत उपाय सोच

संत तुकाराम जीवन परिचय

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सन्तों की इस कड़ी में आज जानते है मराठी सन्त तुकाराम जी के बारे में।मेरा कोटि कोटि प्रणाम। संत तुकाराम मराठी संत संत तुकाराम जिन्हें तुकाराम के नाम से भी जाना जाता है सत्रहवीं शताब्दी एक महान संत कवि थे जो भारत में लंबे समय तक चले भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ थे। तुकाराम का जीवन चरित तुकाराम का जन्म पुणे जिले के अंतर्गत देहू नामक ग्राम में शके 1520; सन्‌ 1598 में हुआ। इनकी जन्मतिथि के संबंध में विद्वानों में मतभेद है तथा सभी दृष्टियों से विचार करने पर शके 1520 में जन्म होना ही मान्य प्रतीत होता है। पूर्व के आठवें पुरुष विश्वंभर बाबा से इनके कुल में विट्ठल की उपासना बराबर चली आ रही थी। इनके कुल के सभी लोग पंढरपुर की यात्रा (वारी) के लिये नियमित रूप से जाते थे। देहू गाँव के महाजन होने के कारण वहाँ इनका कुटूंब प्रतिष्ठित माना जाता था। इनकी बाल्यावस्था माता कनकाई व पिता बहेबा (बोल्होबा) की देखरेख में अत्यंत दुलार से बीती, किंतु जब ये प्राय: 18 वर्ष के थे इनके मातापिता का स्वर्गवास हो गया तथा इसी समय देश में पड़ भीषण अकाल के कारण इनकी प्रथम पत्नी व छोटे बालक की भूख के कारण तड़

संत नामदेव जीवन परिचय

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संतों की कड़ी में आज जानते  है भक्त शिरोमणि सन्त नामदेव जी के बारे में।मेरा कोटि कोटि प्रणाम।  संत नामदेव का जन्म 26अक्तूबर,1270 ई.को महाराष्ट्र में नरसीबामनी नामक गांव में हुआ.इनके पिता का नाम दामाशेट था और माता का नाम गोणाई था.कुछ विद्वान इनका जन्म स्थान पण्ढरपुर मानते हैं.दामाशेट बाद में पण्ढरपुर आकर विट्ठल की मूर्ति के उपासक हो गए थे.इनका पैतृक व्यवसाय दर्जी का था. बचपन - अभी नामदेव पांच वर्ष के थे.तब इनके पिता विट्ठल की मूर्ति को दूध का भोग लगाने का कार्य नामदेव को सौंप कर कहीं बाहर चले गए.बालक नामदेव को पता नहीं था कि विट्ठल की मूर्ति दूध नहीं पीती, उसे तो भावनात्मक भोग लगवाया जाता है.नामदेव ने मूर्ति के आगे पीने को दूध रखा.मूर्ति ने दूध पीया नहीं, तो नामदेव हठ ठानकर बैठ गए कि जब तक विट्ठल दूध नहीं पीएंगे, वह वहां से हटेंगे नहीं.कहते हैं हठ के आगे विवश हो विट्ठल ने दूध पी लिया. जब मंदिर का मुह घूमकर नामदेव की ओर हो गया एक बार संत नामदेव शिवरात्रि के अवसर पर एक मंदिर में शिव के दर्शन के लिए गये.तभी पंडितो का समाज आया, नीची जाति के लोगो को भजन करते देख उन्हें अच्छा नहीं लगा

मंगल ग्रह के उपाय

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मंगल ग्रह शांति, मंत्र एवं उपाय मंगल ग्रह को पराक्रम और साहस का कारक माना जाता है। मंगल ग्रह शांति के लिए कई उपाय बताये गए हैं। इनमें मंगलवार का व्रत, हनुमान जी की आराधना और सुंदर कांड का पाठ आदि प्रमुख है। कुंडली में मंगल की शुभ स्थिति से शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है। वहीं मंगल के अशुभ प्रभाव से मांस, रक्त और अस्थि जनित रोग होते हैं। यदि मंगल अशुभ फल दे रहा है तो मंगल से संबंधित उपाय करना चाहिए। मंगल ग्रह शांति के लिए मंगल यंत्र की स्थापना, मंगलवार को मंगल से संबंधित वस्तु का दान, अनंत मूल की जड़ धारण करना चाहिए। इनके अलावा भी वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह से संबंधित कई उपाय बताये गये हैं। इन कार्यों को करने से मंगल ग्रह से शुभ फल की प्राप्ति होती है और अशुभ प्रभाव दूर होते हैं। वेश-भूषा एवं जीवन शैली से जुड़े मंगल ग्रह शांति के उपाय लाल एवं कॉपर शेड कलर के वस्त्र धारण करें। अपनी मातृभूमि एवं सेना का सम्मान करें। भाई, साले एवं दोस्तों के साथ मधुर व्यवहार बनाए रखें। मंगलवार के दिन पैसे उधार न लें। विशेषतः सुबह किये जाने वाले मंगल ग्रह के उपाय हनुमान जी की आराधना करें। नरसि

शनि ग्रह के उपाय

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शनि को वैदिक ज्योतिष में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह का बड़ा महत्व है। हिन्दू ज्योतिष में शनि ग्रह को आयु, दुख, रोग, पीड़ा, विज्ञान, तकनीकी, लोहा, खनिज तेल, कर्मचारी, सेवक, जेल आदि का कारक माना जाता है। यह मकर और कुंभ राशि का स्वामी होता है। तुला राशि शनि की उच्च राशि है जबकि मेष इसकी नीच राशि मानी जाती है। शनि का गोचर एक राशि में ढ़ाई वर्ष तक रहता है। ज्योतिषीय भाषा में इसे शनि ढैय्या कहते हैं। नौ ग्रहों में शनि की गति सबसे मंद है। शनि की दशा साढ़े सात वर्ष की होती है जिसे शनि की साढ़े साती कहा जाता है। समाज में शनि ग्रह को लेकर नकारात्मक धारणा बनी हुई है। लोग इसके नाम से भयभीत होने लगते हैं। परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। ज्योतिष में शनि ग्रह को भले एक क्रूर ग्रह माना जाता है परंतु यह पीड़ित होने पर ही जातकों को नकारात्मक फल देता है। यदि किसी व्यक्ति का शनि उच्च हो तो वह उसे रंक से राज बना सकता है। शनि तीनों लोकों का न्यायाधीश है। अतः यह व्यक्तियों को उनके कर्म के आधार पर फल प्रदान करता है। शनि पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का स्वामी होता है।

वृहस्पति ग्रह के बारे में

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वृहस्पति देव गुरु माने गए हैं। ऋषि कर्दम की तीसरी पुत्री श्रद्धा का विवाह ऋषि अंगिरा मुनि के साथ हुआ था ।उन्हि के गर्भ से वृहस्पति का जन्म हुआ है।पुराणों के अनुसार वृहस्पति की स्थिति मंगल से ऊपर दो लाख योजन की दुरी पर है।यदि वृहस्पति वक्र गति से न चले तो एक राशि को एक वर्ष में पार कर लेता है।इनका आकर सभी ग्रहो से बड़ा है।सूर्य से इनकी दुरी 48, 32 00000 मील मानी जाती है।पृथ्वी से 36, 7000000 दुरी पर है।इनका आधिपत्य जीव ह्रदय कोष, चर्बी तथा कफ पर है।मानव शरीर में कमर से जंघा तक इसका अधिकार क्षेत्र है।यह विवेक बुद्धि ज्ञान पारलौकिक सुख स्वास्थ्य आध्यात्मिकता उदारता धर्म न्याय सिद्धांतवादिता उच्चाभिलाषी शान्त स्वभाव राजनीतिज्ञता पुरोहितत्व मंत्रित्व यश सम्मान पति का कल्याण पवित्र व्यवहार आदि के अतिरिक्त धन संतान तथा बड़े भाई का भी प्रतिनिधित्व है।यह कफ तथा चर्बी की वृद्धि करता है।हृदय कोष सम्बन्धि रोग ,क्षय ,मुरक्षा ,गुल्म,शोध, का इसी से संबंद्ध माना गया है।गुरु के अशुभ स्थिति में होने पे इन रोगों की उत्पत्ति होती है।यह अपने दशा में कफ तथा चर्बी पर विशेष प्रभाव डालता है। प्रिय वस्तु

शुक्र ग्रह के उपाय

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शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र, जो “साफ़, शुद्ध” या “चमक, स्पष्टता” के लिए संस्कृत रूप है, भृगु और उशान के बेटे का नाम है और वे दैत्यों के शिक्षक और असुरों के गुरु हैं जिन्हें शुक्र ग्रह के साथ पहचाना जाता है, (सम्माननीय शुक्राचार्य के साथ). वे ‘शुक्र-वार’ के स्वामी हैं। प्रकृति से वे राजसी हैं और धन, खुशी और प्रजनन का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे सफेद रंग, मध्यम आयु वर्ग और भले चेहरे के हैं। उनकी विभिन्न सवारियों का वर्णन मिलता है, ऊंट पर या एक घोड़े पर या एक मगरमच्छ पर. वे एक छड़ी, माला और एक कमल धारण करते हैं और कभी-कभी एक धनुष और तीर. ज्योतिष में, एक दशा होती है या ग्रह अवधि होती है जिसे शुक्र दशा के रूप में जाना जाता है जो किसी व्यक्ति की कुंडली में 20 वर्षों तक सक्रिय बनी रहती है। यह दशा, माना जाता है कि किसी व्यक्ति के जीवन में अधिक धन, भाग्य और ऐशो-आराम देती है अगर उस व्यक्ति की कुंडली में शुक्र मज़बूत स्थान पर विराजमान हो और साथ ही साथ शुक्र उसकी कुंडली में एक महत्वपूर्ण फलदायक ग्रह के रूप में हो. शुक्र ग्रह दोष के प्रभाव: बिना किसी बीमारी के अंगूठे, त्वचा संबं

बुध ग्रह के उपाय

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ज्योतिष में बुध को बुद्धि, बौद्धिक क्षमता, तर्क शक्ति, निर्णय शक्ति, स्मृण शक्ति, वाणी, वाक्शक्ति, व्यव्हार कुशलता, चातुर्य, व्यापार, वाणिज्य, गणनात्मक विषय, सूचना, संचार, यातायात, मस्तिष्क, नर्वससिस्टम, त्वचा आदि का कारक माना गया है... मिथुन और कन्या बुध की स्व राशि हैं और कन्या में ही बुध उच्च स्थिति में भी होता है शुक्र, शनि और राहु बुध के मित्र ग्रह हैं बुध क्योंकि बुद्धि का कारक है तो आईये देखते हैं बुध कैसे परिणाम देता है.... बुधवार और बुध ग्रह के उपाय बुधवार को गाय की सेवा उत्तम उपाय है , गाय को हरी घास खिलाने और जल पिलाने से बुध और शुक्र उत्तम प्रभाव देते हैं , जिस से व्यापार और सेहत ठीक होती है और घर में लक्ष्मी की कृपा होती है । बुधवार की सुबह मन्दिर जा कर गणेश जी को हरी दूर्वा अर्पित करने से भी बुध मजबूत होता है , जिस से दिमाग तेज होता है , याद रखने की क्षमता बड़ जाती है , कारोबार में वृद्धि होती है ।  बुधवार की शाम को पानी वाला नारियल मां दुर्गा के चरणों में अर्पित करने से राहु ग्रह के दुष्प्रभावों से राहत मिलती है .....ज्योतिष शास्त्र अनुसार बुध ग्रह का रंग हरा म

सूर्य ग्रह के उपाय

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सूर्य ग्रह से प्रदान किये जाने वाले रोग जातक के गल्ती करने और आत्म विश्लेषण के बाद जब निन्दनीय कार्य किये जाते हैं, तो सूर्य उन्हे बीमारियों और अन्य तरीके से प्रताडित करने का काम करता है, सबसे बडा रोग निवारण का उपाय है कि किये जाने वाले गलत और निन्दनीय कार्यों के प्रति पश्चाताप, और फ़िर से नही करने की कसम, और जब प्रायश्चित कर लिया जाय तो रोगों को निवारण के लिये रत्न,जडी, बूटियां, आदि धारण की जावें, और मंत्रों का नियमित जाप किया जावे.सूर्य ग्रह के द्वारा प्रदान कियेजाने वाले रोग है- सिर दर्द,बुखार, नेत्र विकार,मधुमेह,मोतीझारा,पित्त रोग,हैजा,हिचकी. यदि औषिधि सेवन से भी रोग ना जावे तो समझ लेना कि सूर्य की दशा या अंतर्दशा लगी हुई है। और बिना किसी से पूंछे ही मंत्र जाप,रत्न या जडी बूटी का प्रयोग कर लेना चाहिये.इससे रोग हल्का होगा और ठीक होने लगेगा. सूर्य ग्रह के रत्न उपरत्न सूर्य ग्रह के रत्नों मे माणिक और उपरत्नो में लालडी, तामडा, और महसूरी.पांच रत्ती का रत्न या उपरत्न रविवार को कृत्तिका नक्षत्र में अनामिका उंगली में सोने में धारण करनी चाहिये.इससे इसका दुष्प्रभाव कम होना चालू हो जात

वृहस्पति के उपाय |brihaspati ke upay

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वृहस्पति के दान व उपाय वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को देव गुरु कहा गया है। गुरु को धर्म, दर्शन, ज्ञान और संतान का कारक माना जाता है। बृहस्पति ग्रह शांति से संबंधित कई उपाय हैं, जिन्हें करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। जन्म कुंडली में बृहस्पति की अनुकूल स्थिति से धर्म, दर्शन और संतान की प्राप्ति होती है। गुरु को वैदिक ज्योतिष में आकाश तत्व का कारक माना गया है। इसका गुण विशालता, विकास और व्यक्ति की कुंडली और जीवन में विस्तार का संकेत होता है। गुरु ग्रह के अशुभ प्रभाव से संतान प्राप्ति में बाधा, पेट से संबंधित बीमारी और मोटापा आदि परेशानी होती है। अगर आप बृहस्पति के अशुभ प्रभाव से पीड़ित हैं तो बृहस्पति ग्रह शांति के लिए ये उपाय करें। इन कार्यों को करने से शुभ फल की प्राप्ति होगी और अशुभ प्रभाव दूर होंगे। वेश-भूषा एवं जीवन शैली से जुड़े बृहस्पति ग्रह शांति के उपाय पीला, क्रीम कलर और ऑफ़ व्हाइट रंग उपयोग में लाया जा सकता है। गुरु ब्राह्मण एवं अपने से बड़े लोगों का सम्मान करें। यदि आप महिला हैं तो अपने पति का सम्मान करें। अपने बच्चे और बड़े भाई से अच्छे संबंध बनाएँ। किसी से झूठ