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Showing posts from November, 2018

संस्कृत व्याकरण में प्रत्याहार

प्रत्याहार 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹  *प्रत्याहार का अर्थ होता है* – 'संक्षिप्त कथन'। व्याकरण में प्रत्याहार विभिन्न वर्ण-समूह को अभीप्सित रूप से संक्षेप में ग्रहण करने की एक पद्धति है। जैसे, 'अण्' से अ इ उ और 'अच्' से समग्र स्वर वर्ण— अ, इ, उ, ऋ, लृ, ओ और औ, इत्यादि। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘ *आदिरन्त्येन सहेता* ’(1-1-71) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि ने निर्देश किया है।  *आदिरन्त्येन सहेता* (1-1-71): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्संज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है। उदाहरण: अच् = प्रथम प्रत्याहार सूत्र ‘अइउण्’ के आदि वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार बनता है। यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है। अतः,  अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ। इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि 5व

बनारस की देव दीपावली 2018 | Astro world

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चतु:श्लोकी भागवत

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                  चतु:श्लोकी भागवत अगर आपके पास इतना समय नहीं है कि पूरी भागवत का पाठ कर सकें और आप करना चाहते हैं। परेशान मत होइये ये चार ऐसे श्लोक हैं जिनमें संपूर्ण भागवत-तत्व का उपदेश समाहित है। यही मूल चतु:श्लोकी भागवत है। पुराणों के मुताबिक, ब्रह्माजी द्वारा भगवान नारायण की स्तुति किए जाने पर प्रभु ने उन्हें सम्पूर्ण भागवत-तत्त्व का उपदेश केवल चार श्लोकों में दिया था। आइये जानते हैं कौन हैं वे चार श्लोक, जिनके पाठ से पूरी भागवत पाठ का फल मिलेगा।  🚩 *श्लोक* 1 अहमेवासमेवाग्रे नान्यद यत् सदसत परम। पश्चादहं यदेतच्च योSवशिष्येत सोSस्म्यहम अर्थ- सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत या उससे परे मुझसे भिन्न कुछ नहीं था। सृष्टी न रहने पर (प्रलयकाल में) भी मैं ही रहता हूं। यह सब सृष्टीरूप भी मैं ही हूँ और जो कुछ इस सृष्टी, स्थिति तथा प्रलय से बचा रहता है, वह भी मैं ही हूं।  🚩*श्लोक* -2 ऋतेSर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो माया यथाSSभासो यथा तम: अर्थ- जो मुझ मूल तत्त्व को छोड़कर प्रतीत होता है और आत्मा में प्रतीत नहीं होता, उसे आत्मा की माया समझो।

अक्षय नवमी व्रत 2018

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अक्षय नवमी ―कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी ‘ अक्षयनवमी ' कहलाती है ।  नीरज उपाध्याय इस दिन स्नान , पूजन , तर्पण तथा अन्नादि के दान से अक्षय फल प्राप्त होता है ।   अष्टम्या नवमी विद्धा कर्तव्या फल कांक्षिणा । न कुर्यान्नवमी तात दशम्या तु कदाचन । ।  = ब्रह्मावैवर्तपुराण के इस वचन के अनुसार अष्टमी विद्धा नवमी ग्रहण करना चाहिये । दशमी विद्धा नवमी त्याज्य है । इस वर्ष शुक्रवार दिनांक 16 नवम्बर को दिन 7 बजकर 12 मिनट से नवमी लग रही है जो शनिवार दिनांक 17 नवम्बर 2018 को दिन 9 बजकर 6 मिनट तक रहेगी । उपवास ( आँवला वृक्ष के नीचे भोजन ) हेतु अपरान्ह व्यापिनी तिथि ग्रहण की जाती है । जो 16 नवम्बर को मनायी जायेगी । दान हेतु पूर्वाह्न व्यापिनी ग्राह्य होने से 17 नवम्बर को अक्षय नवमी मनायी जायेगी । बत विधान - प्रातः काल स्नानादि के अनन्तर दाहिने हाथ में जल - अक्षत , पुष्प आदि लेकर निम्न प्रकार से व्रत का संकल्प करे अद्येत्यादि अमुकगोत्रोऽमुक शर्माह ( वर्मा , गुप्तो , वा ) ममाखिलपापक्षयपूर्वकधर्मार्थका । ” ममोक्षसिद्धिद्धारा श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं धात्रीमूले विष्णुपूजनं धात्रीपूजनं च करिष

छठ पूजा महत्व

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इस पृथवीतल सम्पूर्ण विश्व में प्राणिमात्र को जीवनदायिनी शक्ति का अक्षय स्त्रोत सम्पूर्ण वस्तुजात के परम प्रकाशक भगवान सूर्य हैं । अखिल काल गणना इन्ही से होती है । दिन एवं रात्रि के प्रवर्तक ये ही है । प्राणिमात्र के जीवनदाता होने के कारण इन्हे विश्व की आत्मा कहा गया है । सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ” । चाहे । नास्तिक हो या आस्तिक , भारतीय हो या अन्य देशीय , स्थावर जंगम सभी इनकी सत्ता स्वीकार करते हैं तथा इनकी ऊर्जा से ऊर्जावान् हो अपने दैनन्दिन कृत्य में प्रवृत्त होते हैं । भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन वेद ( संहिता , ब्राह्मण , आरण्यक , उपनिषद् ) आर्ष ग्रन्थ ( रामायण , महाभारत , पुराण आदि ) सभी करते हैं । उन भगवन् प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना प्राणिमात्र को करनी चाहिये , क्योंकि आराधना के आराध्यस्थ दिव्य गुणों का संकमण आराधक में भी अवश्य होता है । इसलिये आस्तिकों में लोक कल्याण की भावना रूप दैवी गुण सर्वाधिक होता है । नास्तिक में निम्न स्वार्थ बुद्धि ही होती है । प्रतिहार षष्ठी जिसे पूर्व प्रान्त ( वाराणसी से लेकर देवरिया , गोरखपुर , बलिया , गाजीपुर , आदि एवं अधिकांश बिहार प्रदे

गाय के घी के फायदे

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रोगानुसार गाय के घी के उपयोग 30 महत्वपूर्ण फायदे* : १. गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है । २. गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है ३. गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है । ४. 20-25 ग्राम गाय का घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांजे का नशा कम हो जाता है । ५. गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है । ६. नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है । ७. गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है ८. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है । ९. गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है । १०. हाथ-पॉँव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है । ११. हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी । १२. गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है । १३. गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारी

अथ दामोदराष्टकम्

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                       ।।अथ दामोदराष्टकम्।। नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं ,  लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमान । ।  यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं ,  परामृष्टमत्यंततो द्रुत्य गोप्या । । ( १ )  भावार्थ : हे प्रभु ! आप ही सभी के ईश्वर सत्य , चित्त , आनन्द स्वरूप है , आपके दोनों कपोलों पर कुण्डल शोभायमान हैं , आप ही गोकुल नामक परम - धाम में शोभायमान हैं , आप दही की । मटकी फ़ोड़ने के कारण माँ यशोदा के डर से भाग रहे हैं लेकिन माँ यशोदा ने किसी तरह से आखिर पकड़ कर ऊखल से बाँध दिया है , मैं ऐसे दामोदर भगवान के चरणों में नमन करता हूँ । ( १ )  रूदन्त मुहुर्नत्रयुग्मं मृजन्तं ,  करांभोजयुगमेन् सातङ्कनेत्रम । |  मुहुःश्वासकंप - त्रिरेखाङ्ककण्ठ ,  स्थितत्रैवदामोदरं भक्तिबद्धम् । ।  भावार्थ : हे प्रभु ! माँ के हाँथ में लाठी देखकर आप रोते हुए बारम्बार अपनी आँखों को अपने दोनों हाँथों से मल रहे हैं , आपके नेत्र भय से व्याकुल हो रहे हैं , आप रूदन के आवेग से सिसकियाँ लेने के कारण तीन रेखा - युक्त कण्ठ में पड़ी हुई मोतियों की माला कम्पित हो रही है , आपका उदर रस्सी से नहीं अपितु माँ यशोदा के प्रगाढ़ प्रेम क

नित्य कर्म के मंत्र

प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र। संग्रह *प्रात: कर-दर्शनम्* कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥ *पृथ्वी क्षमा प्रार्थना* समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥ *त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण* ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ *स्नान मन्त्र* गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥ *सूर्यनमस्कार* ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम् सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥ ॐ मित्राय नम: ॐ रवये नम: ॐ सूर्याय नम: ॐ भानवे नम: ॐ खगाय नम: ॐ पूष्णे नम: ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ॐ मरीचये नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ अर्काय नम: ॐ भास्कराय नम: ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम: आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ *संध्या दीप दर्शन* शुभं