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Showing posts from January, 2019

श्री रामचरितमानस कैसी है | astro world

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ज्योतिष एक विज्ञान

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ज्योतिष क्या है ज्योतिष सिर्फ और सिर्फ एक विज्ञान है जिससे ग्रहों की ऊर्जा का आपके शरीर मन और आत्मा पर प्रभाव को देखा जाता है ज्योतिष को समझने के लिए पहले हमें ग्रहों को समझना होता है ग्रहों में सबसे पहले इनकी गति को पकड़ना होता है ग्रह तो घूम रहे है और यह घूमते रहते है इसलिए सबसे जरूरी यही होता है कि ग्रहों की गति को समझा जाए उसके बाद इनकी चाल होती है कितनी रफ्तार है ग्रहों में इनकी स्पीड का आकलन करना जरूरी होती है जब ग्रह में गति होगी तभी तो वो कुछ काम कर पाएगा जब भी ग्रह मार्गी से वक्री होता है या वक्री से मार्गी वो कुछ पल के लिए रुक जाता है ना वो आगे की तरफ चलता है न पीछे की तरफ उस वक़्त ग्रह की कोई गति नही होती यह ऐसे ही है जैसे आप आगे चल रहे है जब आप पीछे की तरफ मुड़ते है तो एक पल के लिए रुक जाते है ऐसे में किसी का जन्म हो और ग्रह में गति न हो वो ग्रह अपना फल नही दे पाता है ज्योतिष की प्रमुख पुस्तकें यहाँ से खरीदे भारतीय ज्योतिष   लेखक– नेमिचन्द्र शास्त्री जातक पारिजात लेखक– कपिलेश्वर शास्त्री मित्रो आप ज्योतिष को एक विज्ञान समझो इनके बारे में पडो पहले सूर्य चंद्

संस्कृत में गणित के सूत्र

देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि संस्कृत भाषा में  जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। देखते हैं - *"चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।* *यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।"* बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है ! इसका अर्थ है - यदि वर्ग की भुजा 2a हो तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a ये क्या है ? अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता है शायद ईसा के जन्म से पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था।हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे , जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है , इस श्लोक का उल्लेख किया है - *परे पूर्णमिति।* *उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।* *तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।* *तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।* *त

भैरवनाथ' का रहस्य

हिन्दू देवता 'भैरवनाथ' का रहस्य !!!!!! हिन्दू धर्म के दो मार्ग दक्षिण और वाम मार्ग में भैरव की उपासना वाममार्गी करते हैं। भैरव का अर्थ होता है जिसका रव अर्थात् शब्द भीषण हो और जो जो देखने में भयंकर हो। इसके अलावा घोर विनाश करने वाला उग्रदेव। भैरव का एक दूसरा अर्थ है जो भय से मुक्त करे वह भैरव। जगदम्बा अम्बा के दो अनुचर है पहले हनुमानजी और दूसरा काल भैरव। भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। भैरव एक पदवी है। भैरव को भगवान् शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि का अधिपति माना गया है। इनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है। भैरव को मानने वाले दो संप्रदाय में विभक्त हैं। पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। भैरव काशी और उज्जैन के द्वारपाल हैं। उज्जैन में काल भैरव की जाग्रत प्रतीमा है जो मदीरापान करती है। इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोड़ा

बजरंग बाण पाठ नियम

1 . बजरंग बाण पाठ नियम घर में यदि कोई स्त्री मासिक अवस्था में हो तो यह पाठ न करें । उस समय किसी मंदिर में जाकर पाठ करें । पाठ के समय अपने पास ही एक आसन श्री हनुमान जी के लिये बिछायें 2 . 3 . नैवेद्य में बाजार की बनाई मिठाई भोग न लगायें । किशमिश , भीगे चने या मुंगफली , सुखा मेवा आदि रखे । पाठ आरंभ के प्रथम और अंतिम दिन श्री हनुमान जी को सिन्दूर , नारियल और ध्वजा भेंट करें । किसी साधु महामा को भोजन करायें या भोजन सामग्री भेंट करें । साथ में दक्षिणा भी दान करें । 5 . । पाठ के पूर्व संकल्प अवश्य करें । संकल्प में स्पष्ट उल्लेख हो कि पाठ किसलिये कर रहे है । 6 . किसी दूषित वासनाजन्य भाव से या किसी सज्जन या साधमहात्मा के विरूध्द प्रयोग न करें अन्यथा स्वयं का ही नाश निश्चित है । 7 . पाठ के रागय भगवान श्री रामचन्द्र जी का गां सीतासहित फोटो भी रखें । | | इसरो श्री हनुमान जी सौम्यरूप हो जाते है । यह ध्यान रहे कि श्री हनुमान जी रूद्रावतार है । नियम अंग होने से हानी होगी । अतः सावधानी से पाठ पूर्ण करें । 9 . पाठ आरंभ होने पर बीच में अधुरा न छोडे । जितना और जैसा संकल्प है , उसी प्रकार से पाठ पुरा क

ज्योतिष में राजयोग

ज्योतिष में राजयोग। राजयोग होने पर व्यक्ति को उच्च पद, मान सम्मान, धन तथा अन्य प्रकार की सुख-संपत्ति प्राप्त होती हैं। अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। जन्म कुंडली में नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृद्धि प्राप्त करता है। राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। कुंडली के लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र-मंगल का योग बन रहा है तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है, मान-सम्मान मिलता है, सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कुंडली में राजयोग का अध्ययन करते वक़्त अन्य शुभ और अशुभ ग्रहों के फलों का भी अध्ययन जरुरी है। इनके कारण राजयोग का प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है। राजयोग वे ग्रह स्थितियां हैं जिनसे व्यक्ति विपुल धन संपदा, पद, गौरव, सुख और ऐश्वर्य

ज्योतिष में राजयोग

ज्योतिष में राजयोग। राजयोग होने पर व्यक्ति को उच्च पद, मान सम्मान, धन तथा अन्य प्रकार की सुख-संपत्ति प्राप्त होती हैं। अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। जन्म कुंडली में नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृद्धि प्राप्त करता है। राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। कुंडली के लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र-मंगल का योग बन रहा है तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है, मान-सम्मान मिलता है, सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कुंडली में राजयोग का अध्ययन करते वक़्त अन्य शुभ और अशुभ ग्रहों के फलों का भी अध्ययन जरुरी है। इनके कारण राजयोग का प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है। राजयोग वे ग्रह स्थितियां हैं जिनसे व्यक्ति विपुल धन संपदा, पद, गौरव, सुख और ऐश्वर्य

हनुमान अष्टमी

29 दिसंबर को हनुमान अष्टमी, इस दिन हनुमानजी को प्रसन्न करने से हर बिगड़ा काम बन जाता है। पौष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हनुमान अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह मंगल पर्व 29 दिसंबर 2018, शनिवार को पड़ रहा है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन हनुमानजी को प्रसन्न करने से हर बिगड़ा काम बन जाता है और जातक पर हनुमत कृपा होती है। आइए जानते हैं कि इस दिन हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए ऐसा क्या किया जाए कि हमें हनुमत कृपा प्राप्त हो... माना जाता है इस खास दिवस पर हनुमान जी को चोला चढ़ाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। परंतु इसके लिए चोला चढ़ाते समय रखें कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना होगा... हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले स्वयं स्नान कर शुद्ध हो जाएं और साफ वस्त्र धारण करें। सिर्फ लाल रंग की धोती पहने तो और भी अच्छा रहेगा। चोला चढ़ाने के लिए चमेली के तेल का उपयोग करें। साथ ही, चोला चढ़ाते समय एक दीपक हनुमान जी के सामने जला कर रख दें। दीपक में भी चमेली के तेल का ही उपयोग करें। चोला चढ़ाने के बाद हनुमान जी को गुलाब के फूल की माला पहनाएं और केवड़े का इत्र हनुमान जी की मूर्ति के दोन