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Showing posts from May, 2020

अंग्रेजो की कूटनीति का पुरी शंकराचार्य द्वारा विश्लेषण

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अंग्रेजो की कूटनीति का पुरी शंकराचार्य द्वारा विश्लेषण आजादी संग्राम के चरम चरण में अंग्रेजो ने भारत का आकलन किया , उन्हें भारत को दिशाहीन करने की भावना से एक कूटनीति का प्रयोग किया  कि राजनेताओ में से ही *किसी वरिष्ठ राजनेता को महात्मा के रूप में ख्यापित किया जाए* , तो व्यासपीठ से सम्बद्ध जो आचार्य है परम्परा के शंकराचार्य आदि उनसे‌ लोग दुर हो जाय। किसी की उपयोगिता को आप निरस्त कर दीजिए , उसका आस्तित्व विलीन हो जायेंगा , यह न्याय दर्शन का शब्द है वेदांत में भी प्रयुक्त होता है , *किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को आप छल , बल डंके की चोट से अन्यथा सिद्ध कीजिए, आस्तित्व रहने पर भी उपयोगिता समाप्त हो गयी निरस्त कर दिया गया !* तो यह अंग्रेजो की कूटनीति थी , मै निन्दा की दृष्टि से कुछ नहीं कहूँगा , सबसे पहले #रविन्द्रनाथ_टैगोर ने #गांधीजी को #महात्मा* शब्द से संबोधित किया , यह इतिहास है ! वह अनुकृति विश्व व्यापी बन गयी , तब हुआ क्या , एक राजनेता जब संत के रूप में ख्यापित कर दिए गए , उसके पीछे अंग्रेजो की कूटनीति थी कि अपने आप #सनातन_वर्ण_व्यवस्था_के_पक्षधर_स्वामी_श्री_करपात्री_जी_महाराज_सभी_शंकराच

निश्चलानंदसरस्वतीजी महाराज एक परिचय

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!!ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री निश्चलानंदसरस्वतीजी महाराज  एक परिचय 👏👏 श्रीगोवर्धनमठ पुरी के वर्तमान १४५वें जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज भारत के एक ऐसे युग पुरुष है , जिनसे आधुनिक युग के सर्वोच्च वैधानिक संगठनो संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व बैंक तक ने मार्गदर्शन प्राप्त किया है ! संयुक्त राष्ट्र संघ ने दिनांक २८ से ३१ अगस्त २००० में न्यूयार्क में आयोजित विश्वशांति शिखर सम्मलेन तथा विश्व बैंक ने वर्ल्ड फेथ्स डेवलपमेंट डाइलोग – २००० के वाशिंगटन सम्मलेन के अवसर पर लिखित मार्गदर्शन प्राप्त किया था ! श्री गोवर्धन मठ से सम्बंधित स्वस्तिप्रकाशन द्वारा इसे क्रमशः “ विश्वशांति का सनातन सिद्धांत “ तथा “ सुखमय जीवन का सनातन सिद्धांत “ शीर्षक से सन २००० में पुस्तक रूप में प्रकाशित किया ! इसके अलावा विश्व के २०० देश चिन्हित किये गए है , जिनके वैज्ञानिको ने कंप्यूटर व् मोबाइल फोन से लेकर अंतरिक्ष तक के क्षेत्र में किये गए आधुनिक अविष्कारों में उन वैदिक गणितीय सिद्धांतो का प्रयोग किया है जो पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी न

पुरी शंकराचार्य जी के द्वारा नकली बाबाओं का पर्दाफाश !

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पुरी शंकराचार्य जी के द्वारा नकली बाबाओं का पर्दाफाश ! मिडिया तंत्र , व्यापार तंत्र और राजतन्त्र इनके द्वारा जो बाबा उठाए जाते है , इन्ही के द्वरा गिरा भी दिए जाते है , यह सब काण्ड चन्द्रास्वामी से प्रारंभ हुआ , नरसिम्हाराव ने उन्हें उठाया था , दलाल बनाया था , तो जो राजनेता , मिडिया और व्यापारियों द्वारा जो बाबा कथावाचक बनाए जाते है , उन्ही के द्वारा गिरा भी दिए जाते है ! गिराए कब जाते है ? इनसे सौदा नहीं पटता तब , अगर सौदा अंतिम साँस तक पट जाए तो कितने भी व्यभिचारी हो , दुराचारी हो जेल के शिकंजे में नहीं, स्वर्ग में रहते है भारत में..  मै उदाहरण देता हूँ – आंध्र में एक साईबाबा थे , उनके शव को देखने के लिए मनमोहनसिंह पहुंचे , सोनियाजी पहुंची या नहीं , वे जेल के शिकंजे में गए क्या ? लेकिन उनके कमरे में ऐशो आराम की कितनी चींजे थी , और जीवनकाल में क्या क्या होता था , सब छपता था , मै तो नहीं जानता इसका मतलब अंतिम समय तक उन्होंने इन तीनो तंत्रों से सामंजस्य साध के रखा , अब कोई कितना ही बुरा हो , शासनतंत्र , व्यापारतंत्र और मिडियातंत्र को कुछ भी लेना देना नहीं , अगर आप तीनो में से किसी से भी

संस्कृत की प्रसिद्ध लोकोक्तियाँ

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संस्कृत की प्रसिद्ध लोकोक्तियाँ 1. संघे शक्ति: कलौ युगे। – एकता में बल है। 2. अविवेक: परमापदां पद्म। – अज्ञानता विपत्ति का घर है। 3. कालस्य कुटिला गति:। – विपत्ति अकेले नहीं आती। 4. अल्पविद्या भयंकरी। – नीम हकीम खतरे जान। 5. बह्वारम्भे लघुक्रिया। – खोदा पहाड़ निकली चुहिया। 6. वरमद्य कपोत: श्वो मयूरात। – नौ नगद न तेरह उधार। 7. वीरभोग्य वसुन्धरा। – जिकसी लाठी उसकी भैंस। 8. शठे शाठ्यं समाचरेत् – जैसे को तैसा। 9. दूरस्था: पर्वता: रम्या:। – दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। 10. बली बलं वेत्ति न तु निर्बल : जौहर की गति जौहर जाने। 11. अतिपर्दे हता लङ्का। – घमंडी का सिर नीचा। 12. अर्धो घटो घोषमुपैति नूनम्। – थोथा चना बाजे घना। 13. कष्ट खलु पराश्रय:। – पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। 14. क्षते क्षारप्रक्षेप:। – जले पर नमक छिड़कना। 15. विषकुम्भं पयोमुखम। – तन के उजले मन के काले। 16. जलबिन्दुनिपातेन क्रमश: पूर्यते घट:। – बूँद-बूँद घड़ा भरता है। 17. गत: कालो न आयाति। – गया वक्त हाथ नहीं आता। 18. पय: पानं भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनम्। – साँपों को दूध पिलाना उनके विष को बढ़ाना है। 19. सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं

पत्नी का अर्थ

पत्नी शब्द की बहुत अच्छी व्याख्या  :- हर स्त्री पत्नी नही होसकती। पत्नी पवित्र शब्द है। इसे पति का स्त्रीलिंग ( पति+ङीप्, नुक्=पत्नी) कहना अनुचित है। पाति रक्षति पा+इति=पति अर्थात स्वामी, किन्तु पत्नी का अर्थ स्वामिनी नहीं है। पति+नी (नी+क्विप्)=पतिनि शब्द का  अपभ्रंश है, पत्नी। नी का अर्थ है, पथ प्रदर्शक अग्रणी आगे- आगे चलने वाला।इसी प्रकार पतिनी का अर्थ है- पति को साथ लेकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति में उसके आगे आगे चलने वाली स्त्री। पतिनी = पत्नी। पत्नी के चार रूप है- धर्म पत्नी, अर्थ पत्नी, काम पत्नी, मोक्ष पत्नी। जिस स्त्री में ये चारों विशेषतायें हैं, वह  पूर्ण पत्नी है। महाराज दशरथ की पत्नी कैकयी पूर्ण पत्नी थी। उसने देव दानव युद्ध में देवताओं का पक्ष लेकर लड़ रहे अपने पति दशरथ के साथ रह कर रथ संचालन करती हुई धर्म पत्नी का रूप प्रस्तुत किया। रथ के नष्ट हो जाने पर उस रथ को पुनः जोड़ कर उन्हें विजय दिलाकर उनका अर्थ सिद्ध किया।इसलिये अर्थ पत्नी हुई। उनके काम भाव को तुष्ट करते हुए उसने भरत जैसा  महान पुत्र दिया।इसलिए काम पत्नी हुई। अंत में उसने अपने प्रति अनुरक्त दशरथ को फटकार