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पत्नी का अर्थ

पत्नी शब्द की बहुत अच्छी व्याख्या  :- हर स्त्री पत्नी नही होसकती। पत्नी पवित्र शब्द है। इसे पति का स्त्रीलिंग ( पति+ङीप्, नुक्=पत्नी) कहना अनुचित है। पाति रक्षति पा+इति=पति अर्थात स्वामी, किन्तु पत्नी का अर्थ स्वामिनी नहीं है। पति+नी (नी+क्विप्)=पतिनि शब्द का  अपभ्रंश है, पत्नी। नी का अर्थ है, पथ प्रदर्शक अग्रणी आगे- आगे चलने वाला।इसी प्रकार पतिनी का अर्थ है- पति को साथ लेकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति में उसके आगे आगे चलने वाली स्त्री। पतिनी = पत्नी। पत्नी के चार रूप है- धर्म पत्नी, अर्थ पत्नी, काम पत्नी, मोक्ष पत्नी। जिस स्त्री में ये चारों विशेषतायें हैं, वह  पूर्ण पत्नी है। महाराज दशरथ की पत्नी कैकयी पूर्ण पत्नी थी। उसने देव दानव युद्ध में देवताओं का पक्ष लेकर लड़ रहे अपने पति दशरथ के साथ रह कर रथ संचालन करती हुई धर्म पत्नी का रूप प्रस्तुत किया। रथ के नष्ट हो जाने पर उस रथ को पुनः जोड़ कर उन्हें विजय दिलाकर उनका अर्थ सिद्ध किया।इसलिये अर्थ पत्नी हुई। उनके काम भाव को तुष्ट करते हुए उसने भरत जैसा  महान पुत्र दिया।इसलिए काम पत्नी हुई। अंत में उसने अपने प्रति अनुरक्त दशरथ को फटकार

संस्कृत में गणित के सूत्र

देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि संस्कृत भाषा में  जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। देखते हैं - *"चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।* *यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।"* बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है ! इसका अर्थ है - यदि वर्ग की भुजा 2a हो तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a ये क्या है ? अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता है शायद ईसा के जन्म से पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था।हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे , जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है , इस श्लोक का उल्लेख किया है - *परे पूर्णमिति।* *उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।* *तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।* *तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।* *त

भैरवनाथ' का रहस्य

हिन्दू देवता 'भैरवनाथ' का रहस्य !!!!!! हिन्दू धर्म के दो मार्ग दक्षिण और वाम मार्ग में भैरव की उपासना वाममार्गी करते हैं। भैरव का अर्थ होता है जिसका रव अर्थात् शब्द भीषण हो और जो जो देखने में भयंकर हो। इसके अलावा घोर विनाश करने वाला उग्रदेव। भैरव का एक दूसरा अर्थ है जो भय से मुक्त करे वह भैरव। जगदम्बा अम्बा के दो अनुचर है पहले हनुमानजी और दूसरा काल भैरव। भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। भैरव एक पदवी है। भैरव को भगवान् शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि का अधिपति माना गया है। इनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है। भैरव को मानने वाले दो संप्रदाय में विभक्त हैं। पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। भैरव काशी और उज्जैन के द्वारपाल हैं। उज्जैन में काल भैरव की जाग्रत प्रतीमा है जो मदीरापान करती है। इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोड़ा

बजरंग बाण पाठ नियम

1 . बजरंग बाण पाठ नियम घर में यदि कोई स्त्री मासिक अवस्था में हो तो यह पाठ न करें । उस समय किसी मंदिर में जाकर पाठ करें । पाठ के समय अपने पास ही एक आसन श्री हनुमान जी के लिये बिछायें 2 . 3 . नैवेद्य में बाजार की बनाई मिठाई भोग न लगायें । किशमिश , भीगे चने या मुंगफली , सुखा मेवा आदि रखे । पाठ आरंभ के प्रथम और अंतिम दिन श्री हनुमान जी को सिन्दूर , नारियल और ध्वजा भेंट करें । किसी साधु महामा को भोजन करायें या भोजन सामग्री भेंट करें । साथ में दक्षिणा भी दान करें । 5 . । पाठ के पूर्व संकल्प अवश्य करें । संकल्प में स्पष्ट उल्लेख हो कि पाठ किसलिये कर रहे है । 6 . किसी दूषित वासनाजन्य भाव से या किसी सज्जन या साधमहात्मा के विरूध्द प्रयोग न करें अन्यथा स्वयं का ही नाश निश्चित है । 7 . पाठ के रागय भगवान श्री रामचन्द्र जी का गां सीतासहित फोटो भी रखें । | | इसरो श्री हनुमान जी सौम्यरूप हो जाते है । यह ध्यान रहे कि श्री हनुमान जी रूद्रावतार है । नियम अंग होने से हानी होगी । अतः सावधानी से पाठ पूर्ण करें । 9 . पाठ आरंभ होने पर बीच में अधुरा न छोडे । जितना और जैसा संकल्प है , उसी प्रकार से पाठ पुरा क

ज्योतिष में राजयोग

ज्योतिष में राजयोग। राजयोग होने पर व्यक्ति को उच्च पद, मान सम्मान, धन तथा अन्य प्रकार की सुख-संपत्ति प्राप्त होती हैं। अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। जन्म कुंडली में नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृद्धि प्राप्त करता है। राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। कुंडली के लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र-मंगल का योग बन रहा है तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है, मान-सम्मान मिलता है, सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कुंडली में राजयोग का अध्ययन करते वक़्त अन्य शुभ और अशुभ ग्रहों के फलों का भी अध्ययन जरुरी है। इनके कारण राजयोग का प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है। राजयोग वे ग्रह स्थितियां हैं जिनसे व्यक्ति विपुल धन संपदा, पद, गौरव, सुख और ऐश्वर्य

ज्योतिष में राजयोग

ज्योतिष में राजयोग। राजयोग होने पर व्यक्ति को उच्च पद, मान सम्मान, धन तथा अन्य प्रकार की सुख-संपत्ति प्राप्त होती हैं। अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। जन्म कुंडली में नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृद्धि प्राप्त करता है। राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। कुंडली के लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र-मंगल का योग बन रहा है तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है, मान-सम्मान मिलता है, सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कुंडली में राजयोग का अध्ययन करते वक़्त अन्य शुभ और अशुभ ग्रहों के फलों का भी अध्ययन जरुरी है। इनके कारण राजयोग का प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है। राजयोग वे ग्रह स्थितियां हैं जिनसे व्यक्ति विपुल धन संपदा, पद, गौरव, सुख और ऐश्वर्य

हनुमान अष्टमी

29 दिसंबर को हनुमान अष्टमी, इस दिन हनुमानजी को प्रसन्न करने से हर बिगड़ा काम बन जाता है। पौष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हनुमान अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह मंगल पर्व 29 दिसंबर 2018, शनिवार को पड़ रहा है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन हनुमानजी को प्रसन्न करने से हर बिगड़ा काम बन जाता है और जातक पर हनुमत कृपा होती है। आइए जानते हैं कि इस दिन हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए ऐसा क्या किया जाए कि हमें हनुमत कृपा प्राप्त हो... माना जाता है इस खास दिवस पर हनुमान जी को चोला चढ़ाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। परंतु इसके लिए चोला चढ़ाते समय रखें कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना होगा... हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले स्वयं स्नान कर शुद्ध हो जाएं और साफ वस्त्र धारण करें। सिर्फ लाल रंग की धोती पहने तो और भी अच्छा रहेगा। चोला चढ़ाने के लिए चमेली के तेल का उपयोग करें। साथ ही, चोला चढ़ाते समय एक दीपक हनुमान जी के सामने जला कर रख दें। दीपक में भी चमेली के तेल का ही उपयोग करें। चोला चढ़ाने के बाद हनुमान जी को गुलाब के फूल की माला पहनाएं और केवड़े का इत्र हनुमान जी की मूर्ति के दोन

सूर्य का रहस्य

सूर्य की बाहरी परतों, जोकि डिस्‍क (फोटोस्फियर) के ऊपर हजारों कि.मी. तक फैला है, को प्रभामंडल कहा जाता है। इसका तापमान मिलियन डिग्री केल्विन से भी अधिक है, जोकि करीबन 6000 केल्विन के सौर डिस्‍क तापमान से भी बहुत अधिक है। सौर भौतिकी में अब तक इस प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं मिल पाया है कि किस प्रकार प्रभामंडल का तापमान इतना अधिक होता है। सूर्य के अध्धयन के लिए नासा के अतिरिक्त विश्व का हर देश जो ब्रम्हांड का रहस्यों को लेकर उत्सुक है सूर्य के अध्धयन के लिए आतुर है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधानो को देखने वाला ISRO भी सूर्य के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने के लिए आदित्‍य-1 मिशन सूर्य की स्टूडी के लिए भेजने की तैयारी कर रहा है, दृश्‍य उत्‍सर्जन रेखा प्रभामंडललेखी (वी.ई.एल.सी.) नामक महत्वाकांक्षी उपग्रह को ले जाने हेतु 400 कि.ग्रा. श्रेणी उपग्रह के रूप में किया गया था तथा उसे 800 कि.मी. निम्‍न भू कक्षा में स्थापित करने की योजना थी। सूर्य-पृथ्‍वी प्रणाली के लेग्रांजी बिंदु के आस-पास प्रभामंडल कक्षा में स्‍थापित उपग्रह से मुख्‍य लाभ यह होता है कि इससे बिना किसी आच्‍छादन/ग्रहण के लगातार सूर्य को देखा जा स

संस्कृत व्याकरण में प्रत्याहार

प्रत्याहार 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹  *प्रत्याहार का अर्थ होता है* – 'संक्षिप्त कथन'। व्याकरण में प्रत्याहार विभिन्न वर्ण-समूह को अभीप्सित रूप से संक्षेप में ग्रहण करने की एक पद्धति है। जैसे, 'अण्' से अ इ उ और 'अच्' से समग्र स्वर वर्ण— अ, इ, उ, ऋ, लृ, ओ और औ, इत्यादि। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘ *आदिरन्त्येन सहेता* ’(1-1-71) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि ने निर्देश किया है।  *आदिरन्त्येन सहेता* (1-1-71): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्संज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है। उदाहरण: अच् = प्रथम प्रत्याहार सूत्र ‘अइउण्’ के आदि वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार बनता है। यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है। अतः,  अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ। इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि 5व

बनारस की देव दीपावली 2018 | Astro world

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चतु:श्लोकी भागवत

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                  चतु:श्लोकी भागवत अगर आपके पास इतना समय नहीं है कि पूरी भागवत का पाठ कर सकें और आप करना चाहते हैं। परेशान मत होइये ये चार ऐसे श्लोक हैं जिनमें संपूर्ण भागवत-तत्व का उपदेश समाहित है। यही मूल चतु:श्लोकी भागवत है। पुराणों के मुताबिक, ब्रह्माजी द्वारा भगवान नारायण की स्तुति किए जाने पर प्रभु ने उन्हें सम्पूर्ण भागवत-तत्त्व का उपदेश केवल चार श्लोकों में दिया था। आइये जानते हैं कौन हैं वे चार श्लोक, जिनके पाठ से पूरी भागवत पाठ का फल मिलेगा।  🚩 *श्लोक* 1 अहमेवासमेवाग्रे नान्यद यत् सदसत परम। पश्चादहं यदेतच्च योSवशिष्येत सोSस्म्यहम अर्थ- सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत या उससे परे मुझसे भिन्न कुछ नहीं था। सृष्टी न रहने पर (प्रलयकाल में) भी मैं ही रहता हूं। यह सब सृष्टीरूप भी मैं ही हूँ और जो कुछ इस सृष्टी, स्थिति तथा प्रलय से बचा रहता है, वह भी मैं ही हूं।  🚩*श्लोक* -2 ऋतेSर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो माया यथाSSभासो यथा तम: अर्थ- जो मुझ मूल तत्त्व को छोड़कर प्रतीत होता है और आत्मा में प्रतीत नहीं होता, उसे आत्मा की माया समझो।

अक्षय नवमी व्रत 2018

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अक्षय नवमी ―कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी ‘ अक्षयनवमी ' कहलाती है ।  नीरज उपाध्याय इस दिन स्नान , पूजन , तर्पण तथा अन्नादि के दान से अक्षय फल प्राप्त होता है ।   अष्टम्या नवमी विद्धा कर्तव्या फल कांक्षिणा । न कुर्यान्नवमी तात दशम्या तु कदाचन । ।  = ब्रह्मावैवर्तपुराण के इस वचन के अनुसार अष्टमी विद्धा नवमी ग्रहण करना चाहिये । दशमी विद्धा नवमी त्याज्य है । इस वर्ष शुक्रवार दिनांक 16 नवम्बर को दिन 7 बजकर 12 मिनट से नवमी लग रही है जो शनिवार दिनांक 17 नवम्बर 2018 को दिन 9 बजकर 6 मिनट तक रहेगी । उपवास ( आँवला वृक्ष के नीचे भोजन ) हेतु अपरान्ह व्यापिनी तिथि ग्रहण की जाती है । जो 16 नवम्बर को मनायी जायेगी । दान हेतु पूर्वाह्न व्यापिनी ग्राह्य होने से 17 नवम्बर को अक्षय नवमी मनायी जायेगी । बत विधान - प्रातः काल स्नानादि के अनन्तर दाहिने हाथ में जल - अक्षत , पुष्प आदि लेकर निम्न प्रकार से व्रत का संकल्प करे अद्येत्यादि अमुकगोत्रोऽमुक शर्माह ( वर्मा , गुप्तो , वा ) ममाखिलपापक्षयपूर्वकधर्मार्थका । ” ममोक्षसिद्धिद्धारा श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं धात्रीमूले विष्णुपूजनं धात्रीपूजनं च करिष

छठ पूजा महत्व

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इस पृथवीतल सम्पूर्ण विश्व में प्राणिमात्र को जीवनदायिनी शक्ति का अक्षय स्त्रोत सम्पूर्ण वस्तुजात के परम प्रकाशक भगवान सूर्य हैं । अखिल काल गणना इन्ही से होती है । दिन एवं रात्रि के प्रवर्तक ये ही है । प्राणिमात्र के जीवनदाता होने के कारण इन्हे विश्व की आत्मा कहा गया है । सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ” । चाहे । नास्तिक हो या आस्तिक , भारतीय हो या अन्य देशीय , स्थावर जंगम सभी इनकी सत्ता स्वीकार करते हैं तथा इनकी ऊर्जा से ऊर्जावान् हो अपने दैनन्दिन कृत्य में प्रवृत्त होते हैं । भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन वेद ( संहिता , ब्राह्मण , आरण्यक , उपनिषद् ) आर्ष ग्रन्थ ( रामायण , महाभारत , पुराण आदि ) सभी करते हैं । उन भगवन् प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना प्राणिमात्र को करनी चाहिये , क्योंकि आराधना के आराध्यस्थ दिव्य गुणों का संकमण आराधक में भी अवश्य होता है । इसलिये आस्तिकों में लोक कल्याण की भावना रूप दैवी गुण सर्वाधिक होता है । नास्तिक में निम्न स्वार्थ बुद्धि ही होती है । प्रतिहार षष्ठी जिसे पूर्व प्रान्त ( वाराणसी से लेकर देवरिया , गोरखपुर , बलिया , गाजीपुर , आदि एवं अधिकांश बिहार प्रदे

गाय के घी के फायदे

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रोगानुसार गाय के घी के उपयोग 30 महत्वपूर्ण फायदे* : १. गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है । २. गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है ३. गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है । ४. 20-25 ग्राम गाय का घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांजे का नशा कम हो जाता है । ५. गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है । ६. नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है । ७. गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है ८. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है । ९. गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है । १०. हाथ-पॉँव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है । ११. हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी । १२. गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है । १३. गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारी

अथ दामोदराष्टकम्

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                       ।।अथ दामोदराष्टकम्।। नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं ,  लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमान । ।  यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं ,  परामृष्टमत्यंततो द्रुत्य गोप्या । । ( १ )  भावार्थ : हे प्रभु ! आप ही सभी के ईश्वर सत्य , चित्त , आनन्द स्वरूप है , आपके दोनों कपोलों पर कुण्डल शोभायमान हैं , आप ही गोकुल नामक परम - धाम में शोभायमान हैं , आप दही की । मटकी फ़ोड़ने के कारण माँ यशोदा के डर से भाग रहे हैं लेकिन माँ यशोदा ने किसी तरह से आखिर पकड़ कर ऊखल से बाँध दिया है , मैं ऐसे दामोदर भगवान के चरणों में नमन करता हूँ । ( १ )  रूदन्त मुहुर्नत्रयुग्मं मृजन्तं ,  करांभोजयुगमेन् सातङ्कनेत्रम । |  मुहुःश्वासकंप - त्रिरेखाङ्ककण्ठ ,  स्थितत्रैवदामोदरं भक्तिबद्धम् । ।  भावार्थ : हे प्रभु ! माँ के हाँथ में लाठी देखकर आप रोते हुए बारम्बार अपनी आँखों को अपने दोनों हाँथों से मल रहे हैं , आपके नेत्र भय से व्याकुल हो रहे हैं , आप रूदन के आवेग से सिसकियाँ लेने के कारण तीन रेखा - युक्त कण्ठ में पड़ी हुई मोतियों की माला कम्पित हो रही है , आपका उदर रस्सी से नहीं अपितु माँ यशोदा के प्रगाढ़ प्रेम क

नित्य कर्म के मंत्र

प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र। संग्रह *प्रात: कर-दर्शनम्* कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥ *पृथ्वी क्षमा प्रार्थना* समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥ *त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण* ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ *स्नान मन्त्र* गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥ *सूर्यनमस्कार* ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम् सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥ ॐ मित्राय नम: ॐ रवये नम: ॐ सूर्याय नम: ॐ भानवे नम: ॐ खगाय नम: ॐ पूष्णे नम: ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ॐ मरीचये नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ अर्काय नम: ॐ भास्कराय नम: ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम: आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ *संध्या दीप दर्शन* शुभं

इन ग्रहों के युति होने से होता है ऐसा

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सूर्य का हमारे जीवन पर प्रभाव और अन्य ग्रहों से युति का फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य मंगल और चन्द्र की युति फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य के साथ मंगल और चन्द्र के होने से पिता पराक्रमी और जिद्दी स्वभाव का माना जाता है,जातक या पिता के पास पानी की मशीने और खेती करने वाली मशीने भी हो सकती है,जातक पानी का व्यवसाय कर सकता है,जातक के भाई के पास यात्रा वाले काम होते है,जातक या पिता का किसी न किसी प्रकार का सेना या पुलिस से लगाव होता है। सूर्य मंगल और बुध युति फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य के साथ मन्गल और बुध के होने से तीन भाई का योग होता है,अगर तीनो ग्रह पुरुष राशि में हो तो,सूर्य और मन्गल मित्र है,इसलिये जातक के दो भाई आज्ञाकारी होते है,बुध मन्गल के सामने एजेन्ट बन जाता है,अत: इस प्रकार के कार्य भी हो सकते है,मंगल कठोर और बुध मुलायम होता है,जातक के भाई के साथ किसी प्रकार का धोखा भी हो सकता है। सूर्य मंगल और गुरु युति फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य मन्गल और गुरु के साथ होने पर जातक का पिता प्रभावशाली होता है,जातक का समाज में स्थान उच्च का होता है,जीवात्मा स